“पुस्तक”

पुस्तकें सभ्यता और संस्कृति की संवाहिका हैं

ये विचारों की अभिव्यक्ति हैं

पुस्तकों के बिना इतिहास चुप है, साहित्य गूंगा है और यहां तक कि विज्ञान भी पंगु है।

“मैकाले के मन में खोट थी”

मैकाले की शिक्षा पद्धति के पीछे उनकी सोच ही विकृत थी। दगाबाजी की थी, धोख़ा किया था। वह हमें सदियों तक गुलाम बनाये रखने के पुख्ता इंतजाम करना चाहता था। अगर आपको इस बात पर भरोसा न हो तो एक नज़र डालें मैकाले के उस उद्बोधन पर जो उसने ब्रिटिश संसद में 2 फरवरी, 1835 को दिया था।

I have tarvelled across the length and breadth of India and I have not seen one person who is theif. Such wealth I have seen in the country, such high moral values, people of such caliber, that I don’t think we would ever conquer this country, unless we break the very backbone of this nation.

Which is her spiritual and cultural heritage, and therefore I propose that we replace her old and ancient education system, her culture, for if the Indian think that is foreign and English is good and greater than their own. They will lose their self-esteem, their native self-culture and they will become what we want them, a truly dominated nation.”

‘Lord Macaulay in his speech of Feb 2, 1835 British Parliament.’

अर्थात भारत के लोगों में गजब के नैतिक मूल्य हैं। दर्शन, धर्म और संस्कृति इस देश की रीढ़ है। इस रीढ़ को तोड़े बिना भारत पर विजय पाना असंभव है। भारतीय शिक्षा पद्धत्ति को बदलकर यदि हम भारतीयों का आत्म-सम्मान तोड़ दें तभी हम सही अर्थों में इस देह को गुलाम बना सकेंगे।

शिक्षा किसी भी व्यक्ति, समाज या देश के लिए रीढ़ के समान होती है। इन तीनो का वर्तमान और भविष्य कैसा होगा यह इसी बात पर निर्भर करता है कि शिक्षा की पद्धत्ति क्या है। सीखने, सिखाने का तरीक़ा क्या है?

भारत की वर्तमान शिक्षा पद्धत्ति की बात करें तो आश्चर्य होता है कि इतना पुराना देश, ऋषि, मुनियों का देश,

शिक्षा-दीक्षा के लिए दुनिया भर में जाना जाने वाला देश आज एक अंग्रेज मैकाले की बनाई शिक्षा पद्धत्ति को जस का तस अपनाए हुए है।

अंग्रेज भी वह जिसका उद्देश्य दर्शन, धर्म और संस्कृति का ज्ञान देने वाली हमारी मूल शिक्षा व्यवस्था को आमूलचूल बदलकर हमारे आत्मसम्मान को तोड़ना था। ऐसी सोच पर टिकी शिक्षा पद्धति कैसे किसी देश का भला कर सकती है। कैसे किसी देश को आगे ले जा सकती है? कैसे किसी देश को सुसंस्कृत बना सकती है? ये सवाल इतने साल तक किसी ने नहीं उठाये। हमारी कितनी ही पीढ़ियां इसी पद्धति के शिकंजे में फंसकर अपना रास्ता भटक गई, कितने ही लोग बहक गए। तोता रटंतो की बाढ़ आ गई इस शिक्षा पद्धति ने हमारे संस्कारों में सेंध मारी। हमें दिखावा अच्छा लगने लगा, चोरी व भ्रष्टाचार में बुराई नजर नहीं आई। नारी भोग की वस्तु बन गई।

“गांधी बनाम गोड़से”

क्या साध्वी प्रज्ञा ठाकुर जी ने देश की संसद में हुतात्मा गोड़से जी को देशभक्त कहकर, हमेशा सत्ता की सियासत पर जारी बहस में गांधी के नाम पर अपने पाले में “गेंद” रखने वाली कांग्रेस पार्टी के ताबूत में आख़िरी कील ठोंक दी; जो भारतीय जनता पार्टी या देश के महनीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ के सपने को एक नवीन ऊर्जा प्रदान करेगी?
एक बात जो देश के आम जन मानस के मन में उठता है वो यह है कि कांग्रेस गांधी बनाम गोड़से की बहस से हमेशा पीछे भागती है, आख़िर कांग्रेस को गोड़से नाम से इतना अधिक चिढ़ क्यों है? क्या कांग्रेस भयभीत है कि अगर वो गांधी बनाम गोड़से की बहस में उतरी तो इसमें जीत गोड़से की होगी और उनकी जो गांधी के नाम पर एक छत्र सत्ता पर एकाधिकार था वो उनके पांवों तले से खिसक जाएगा?

एक बात अब स्पष्ट हो जाता है कि कांग्रेस ने जो हिन्दू आतंकवादी की मनगढंत थ्योरी गढ़ी थी, उसका माकूल जवाब देने के लिए ही भारतीय जनता पार्टी ने साध्वी प्रज्ञा को संसद की चारदीवारी के अंदर सांसद के रूप में पदार्पण करवाया और साध्वी प्रज्ञा ठाकुर ने भी ईंट का जवाब पत्थर से देने के लिए तैयार रणभूमि में गोड़से जी को देशभक्त कहकर शंखनाद कर दिया है।
जहां एक ओर कांग्रेस को गांधी के नाम पर वोट बैंक का धंधा चौपट होता दिख रहा है वहीं दूसरी ओर प्रज्ञा ठाकुर ने कांग्रेस के सामने बहस की निम्न खुली चुनौती का पिटारा खोल के रख दिया.. ये पिटारे कुछ इस तरह होंगे

गांधी बनाम ज़िन्ना
नेहरू बनाम सरदार पटेल जी
गोडसे का कोर्ट में दिए बयान को कांग्रेस द्वारा क्यों छुपाया गया?
लाल बहादुर की रहस्यमयी मौत की फाइलों का सार्वजनिक ना किया जाना
नेहरु बनाम नेता जी सुभाषचंद्र बोस
और सबसे अहम गांधी जी द्वारा अपने प्रिय नेहरू की ताजपोशी के लिए देश को धर्म के आधार पर दो टुकड़ों में बांट देना।
अगर बापू देश के इतने ही सच्चे पिता थे तो जिस समय देश के ज़्यादातर आम जनमानस को दो वक़्त का निवाला नसीब नहीं होता था उस समय नेहरू के लिए दूसरे देश से सिगरेट मंगवाया जाता था, इनके कपड़े लांड्री में धुलते थे, इनके परिवार की ऐशो आराम की ज़िंदगी चल रही थी तो बापू के मुंह से नेहरू या नेहरू खानदान के खिलाफ एक शब्द मुंह से न निकले? गांधी आखिर आपकी ऐसी क्या मजबूरी रही होगी?
क्या आपके इस मौन ने ही गोड़से जी को विवश किया आपकी हत्या करने को, आज इस यक्ष प्रश्न के सवाल का जवाब हर हिंदुस्तानी ढूंढ रहा है?

“दुःख का आरंभ”

छोटे शिशु को देखो! लेटा हुआ आकाश के साथ कुश्ती करता है। उसके तोतले शब्द भी मधुर लगते हैं।

क्योंकि उसके हृदय में इच्छाओं के द्वंद और अहंकार अभी ठोस नहीं बने हैं।

उसके चित्त में अभी ‘मैं’ और ‘मेरा’ का द्वंद पनपा नहीं है।

बड़े होने पर उसके चित्त में जब द्वंद जगेंगे तब उसकी सरलता दूर हो जाएगी, उसमें दोष आ जाएंगे और अहंकार पुष्ट होगा।

यहीं से उसके दुःखों का आरंभ हो जाता है।

“Attitude”

“अगर आप सोचते हैं”

अगर आप सोचते हैं कि आप हार गए हैं, तो आप हारे हैं
अगर आप सोचते हैं कि आपमें हौसला नहीं है, तो सचमुच नहीं है।

अगर आप जीतना चाहते हैं–
मगर सोचते हैं कि जीत नहीं सकते, तो निश्चित है कि आप नहीं जीतेंगे
अगर आप सोचते हैं कि हार जाएंगे
तो आप हार चुके हैं

क्योंकि हम देखते हैं कि
सफलता की शुरुआत इंसान की इच्छा से शुरू होती है
यह सब कुछ हमारी सोच पर निर्भर करता है
अगर आप सोचते हैं कि पिछड़ गए हैं
तो आप पिछड़ गए हैं।

तरक्क़ी करने के लिए आपको अपनी सोच ऊंची करनी होगी
कोई भी सफलता प्राप्त करने से पहले आपको अपने प्रति विश्वास लाना होगा
जीवन की लड़ाईयां हमेशा
सिर्फ तेज़ और मज़बूत लोग ही नहीं जीतते
बल्कि आज नहीं तो कल जीतता वही आदमी है
जिसे यक़ीन है कि वह जीतेगा।